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इटावा: रात के अंधेरे में जमींदोज हुई ‘बीहड़ वाले सैयद बाबा’ की मजार, वन विभाग ने रातों-रात कर दिया वृक्षारोपण

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इटावा के फिशर वन क्षेत्र में तीन बुलडोजरों के साथ मजार हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई का प्रतीकात्मक दृश्य

इटावा गुरुवार, 11 जून 2026

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले से अतिक्रमण के खिलाफ एक बड़ी और चौंकाने वाली कार्रवाई सामने आई है। इटावा शहर से महज डेढ़ किलोमीटर दूर बीहड़ के संरक्षित फिशर वन क्षेत्र (Fisher Forest Area) में स्थित प्रसिद्ध “बीहड़ वाले सैयद बाबा” की मजार को बुधवार रात भारी सुरक्षा बल और तीन बुलडोजरों की मदद से पूरी तरह जमींदोज कर दिया गया।

बुधवार शाम 6 बजे शुरू हुआ यह प्रशासनिक ऑपरेशन करीब 7 घंटे तक चला और रात 1 बजे तक मजार का नामो-निशान मिटाकर जमीन को पूरी तरह समतल कर दिया गया। गुरुवार सुबह जब स्थानीय ग्रामीण और मजार से जुड़े लोग वहां पहुंचे, तो नजारा देखकर दंग रह गए। 3000 स्क्वायर फीट में फैली मजार की जगह अब कमर तक ऊंचे पौधे नजर आ रहे थे और पूरे इलाके को एक घने जंगल की तरह रूप दे दिया गया था।

3 जनवरी से शुरू हुआ था कानूनी शिकंजा

इस पूरी कार्रवाई की नींव इसी साल जनवरी की शुरुआत में पड़ी थी। मुख्यमंत्री पोर्टल (IGRS) पर हिंदू संगठनों द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई थी कि यह मजार वन विभाग की आरक्षित भूमि पर अवैध रूप से बनाई गई है। इसके बाद शुरू हुए घटनाक्रम को 5 मुख्य बिंदुओं में समझा जा सकता है:

  • शिकायत और शुरुआती जांच: 3 जनवरी, 2026 को शिकायत के बाद, 5 जनवरी को जिला मजिस्ट्रेट (DM) कार्यालय के निर्देश पर वन विभाग ने मजार की भूमि की पैमाइश और जांच शुरू की।

  • ऐतिहासिक राजपत्रों (Gazettes) का हवाला: वन रेंज अधिकारी अशोक कुमार शर्मा की जांच में पाया गया कि मजार फिशर वन के कंपार्टमेंट नंबर-3 में स्थित है। वन विभाग के रिकॉर्ड और वर्ष 1916, 1936 तथा 1946 के राजपत्रों के अनुसार, यह पूरी भूमि वन विभाग के नाम दर्ज है। वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत यहां कोई भी गैर-वानिकी कार्य प्रतिबंधित है।

  • इबादत पर रोक और कोर्ट केस: 23 जनवरी को वन विभाग की टीम ने मौके पर जाकर जमीन की अंतिम नपाई की और मजार में होने वाली धार्मिक गतिविधियों पर तत्काल रोक लगा दी। इसी दिन जिला वन अधिकारी (DFO) की अदालत में बेदखली का वाद दायर किया गया, जिसकी पहली सुनवाई 5 फरवरी को हुई।

  • दस्तावेज पेश करने में नाकाम रहा मुस्लिम पक्ष: मजार के खादिम और केयरटेकर फजले इलाही ने जवाब देने के लिए अदालत से समय मांगा था। कोर्ट ने उन्हें 16 फरवरी, 20 फरवरी, 23 मार्च और अंत में 28 मार्च तक का समय दिया, लेकिन मजार पक्ष जमीन के मालिकाना हक या निर्माण की अनुमति से जुड़ा कोई भी वैध कानूनी दस्तावेज पेश नहीं कर सका। इसके बाद अदालत ने बेदखली और ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया।

  • ऊपरी अदालत से भी झटका: जिला वन अधिकारी के आदेश के खिलाफ केयरटेकर फजले इलाही ने कानपुर स्थित वन संरक्षक (Conservator of Forests) के समक्ष अपील दायर की थी। मगर लंबी सुनवाई के बाद वहां से भी मजार पक्ष की अपील को खारिज कर दिया गया, जिसके बाद इस बुलडोजर एक्शन का रास्ता साफ हुआ।

इतिहास और दावों का अंतहीन विवाद

मजार के केयरटेकर के सहयोगी मौलाना नदीम का दावा था कि यह मजार करीब 800 साल पुरानी है। स्थानीय स्तर पर कुछ लोग इसे विदेशी इस्लामी आक्रांता मोहम्मद गौरी के सेनापति शमसुद्दीन की मजार बताते आ रहे थे, जिसे मौलाना नदीम ने भी ऐतिहासिक रूप से गलत और निराधार बताया था।

ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक, साल 1194 में इटावा में मोहम्मद गौरी और कन्नौज के राजा जयचंद के सिपहसालार सुमेर सिंह के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इसमें गौरी का सेनापति शमसुद्दीन मारा जरूर गया था, लेकिन उसकी मजार फिशर वन क्षेत्र में ही है, इसका कोई पुख्ता लिखित इतिहास या सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।

धीरे-धीरे हुआ था पक्का निर्माण

वन विभाग के अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि समय के साथ संरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण बढ़ता गया और बिना किसी वैधानिक अनुमति के एक छोटा सा स्थान स्थायी पक्के ढांचे में तब्दील हो गया। हर साल फरवरी में यहाँ उर्स का आयोजन होता था, जिसमें 5 से 7 हजार लोग आते थे, हालांकि इस साल प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी थी।

सुरक्षा के लिहाज से वन विभाग और पुलिस ने बुधवार शाम को ही मजार की तरफ जाने वाले रास्तों पर गहरे गड्ढे खोद दिए थे और भारी पुलिस बल तैनात कर मीडिया और बाहरी लोगों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। कोर्ट के आदेश के अनुपालन में की गई इस गुपचुप कार्रवाई के बाद अब खाली हुई सरकारी जमीन पर वन विभाग बड़े पैमाने पर पौधारोपण कर रहा है।

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