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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: गैर-मौजूद कानून के आधार पर दिया गया तलाक रद्द, बांदा फैमिली कोर्ट को लगाई फटकार

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प्रयागराज | शुक्रवार, 17 अप्रैल, 2026

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में बांदा की फैमिली कोर्ट द्वारा एक मुस्लिम महिला को दी गई तलाक की डिक्री को पूरी तरह रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने अपना फैसला एक ऐसे अधिनियम के आधार पर सुनाया, जिसका भारतीय कानून की किताबों में अस्तित्व ही नहीं है। हाई कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के प्रति एक “कैजुअल रवैया” करार देते हुए सख्त नाराजगी जाहिर की है।

क्या था पूरा मामला? (हाफिज बनाम परवीन खातून)

यह कानूनी विवाद हाफिज बनाम परवीन खातून के नाम से चर्चित है। बांदा की फैमिली कोर्ट ने 28 जनवरी को एक आदेश पारित किया था, जिसमें पति-पत्नी के निकाह को समाप्त करने का आदेश दिया गया। इस आदेश का आधार ‘मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986’ को बनाया गया था।

जब यह मामला अपील के जरिए हाई कोर्ट पहुँचा, तो जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने पाया कि जिस कानून के तहत तलाक दिया गया, वह कानून वास्तव में भारत में है ही नहीं।

कानूनी भ्रम: 1939 बनाम 1986

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में मुस्लिम महिलाओं के विवाह विच्छेद के लिए ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939’ (Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939) प्रभावी है। वहीं, 1986 का जो अधिनियम अस्तित्व में है, उसका नाम ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम’ है, जो मुख्य रूप से गुजारा भत्ता (Maintenance) से संबंधित है।

“एक वरिष्ठ जिला जज द्वारा पूरे फैसले में लगातार एक अस्तित्वहीन कानून का हवाला देना गंभीर लापरवाही है। यह सुनिश्चित करना अदालत की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह जिस कानून का उल्लेख कर रही है, वह वास्तव में लागू हो।” – इलाहाबाद हाई कोर्ट

हाई कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें

  1. फैसला रद्द और रिमांड: हाई कोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया है और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है।

  2. समय सीमा का निर्धारण: कोर्ट ने निर्देश दिया है कि फैमिली कोर्ट को अब तीन महीने के भीतर सही कानून (1939 अधिनियम) के तहत नया फैसला सुनाना होगा।

  3. साक्ष्यों का पुनः उपयोग: अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में नए सिरे से गवाही या ट्रायल की जरूरत नहीं है। पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर ही कानून की सही व्याख्या करते हुए नया आदेश पारित किया जाएगा।

इस फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला निचली अदालतों के लिए एक चेतावनी की तरह है। अक्सर टाइपिंग की गलती या कानूनी धाराओं के गलत उल्लेख को सामान्य मान लिया जाता है, लेकिन जब बात विवाह और तलाक जैसे संवेदनशील मुद्दों की हो, तो एक गलत ‘वर्ष’ या ‘अधिनियम का नाम’ पूरे फैसले की कानूनी वैधता को शून्य कर सकता है।

संशोधित जानकारी तालिका

विवरण गलत तथ्य (ट्रायल कोर्ट) सही तथ्य (हाई कोर्ट के अनुसार)
अधिनियम का नाम मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939
कानूनी स्थिति भारत में अस्तित्व में नहीं है प्रभावी भारतीय कानून
अगली कार्यवाही मामला बंद 3 महीने में नया फैसला अनिवार्य

निष्कर्ष: इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस हस्तक्षेप ने न केवल एक गलत कानूनी प्रक्रिया को रोका है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया है कि वादी और प्रतिवादी को सही संवैधानिक और कानूनी ढांचे के भीतर न्याय मिले। अब सबकी निगाहें बांदा फैमिली कोर्ट के आगामी फैसले पर टिकी हैं।

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