वॉशिंगटन डीसी. गाजा में जारी लंबे संघर्ष को समाप्त करने और पुनर्निर्माण की दिशा में एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय कदम उठाया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नव-गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) की पहली उच्चस्तरीय बैठक वॉशिंगटन डीसी में आयोजित की गई। इस महत्वपूर्ण बैठक में भारत ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, हालांकि भारत ने फिलहाल इस मंच पर पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लेने का निर्णय लिया है।
कूटनीतिक संतुलन की ओर भारत का कदम
बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास की प्रभारी (Chargé d’affaires) नामग्या खम्पा ने किया। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक की भूमिका चुनना भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का हिस्सा है। इसका अर्थ यह है कि भारत इस शांति प्रक्रिया का समर्थन तो करता है, लेकिन वह फिलहाल किसी भी कानूनी बाध्यता या सामूहिक निर्णय से नहीं बंधेगा।
प्रमुख देशों की भागीदारी और रुख
जहाँ एक ओर पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अर्जेंटीना सहित 27 देशों ने इस बोर्ड की पूर्ण सदस्यता ग्रहण कर ली है, वहीं भारत के साथ जर्मनी, इटली, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड और यूनाइटेड किंगडम ने भी Observer का दर्जा ही चुना है।
विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, भारत इस नई पहल के संस्थागत ढांचे और संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी वैश्विक संस्थाओं पर इसके प्रभाव का बारीकी से अध्ययन कर रहा है।
क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का लक्ष्य?
राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा शुरू की गई इस पहल के तीन मुख्य उद्देश्य हैं:
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युद्धविराम की निगरानी: गाजा में स्थायी शांति के लिए जमीनी स्तर पर निगरानी।
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मानवीय सहायता: प्रभावित क्षेत्रों तक भोजन, दवाइयां और बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना।
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पुनर्निर्माण: युद्ध से तबाह हुए बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करना।
अमेरिका ने इस नेक कार्य के लिए 10 बिलियन डॉलर (लगभग 83,000 करोड़ रुपये) की वित्तीय सहायता देने का संकल्प भी व्यक्त किया है।
प्रधानमंत्री मोदी का दृष्टिकोण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पहल का स्वागत करते हुए इसे गाजा संघर्ष के समाधान की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह मानवता के पक्ष में खड़ा है और क्षेत्र में शांति बहाली के हर सार्थक प्रयास का समर्थन करेगा, बशर्ते वह अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप हो।
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