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दिल्ली दंगे 2020: कड़कड़डूमा कोर्ट ने तीन आरोपियों को ठहराया दोषी, जानिए क्या है ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ का कानून

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कड़कड़डूमा कोर्ट दिल्ली की इमारत का बाहरी दृश्य

नई दिल्ली । गुरुवार, 21 मई 2026

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में साल 2020 में भड़की सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में कड़कड़डूमा जिला अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने खजूरी खास और भजनपुरा इलाके में पुलिसकर्मियों पर जानलेवा पथराव करने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में तीन अभियुक्तों को दोषी करार दिया है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) प्रवीन सिंह ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद आरोपी इकराम, सरफराज और मुस्तकीम के खिलाफ अभियोजन पक्ष के दावों को सही पाया। इस फैसले ने एक बार फिर आपराधिक मामलों में ‘भीड़ की सामूहिक जिम्मेदारी’ के कानूनी सिद्धांत को रेखांकित किया है।

मामला क्या था? (24 फरवरी 2020 की हिंसा)

अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, यह घटना 24 फरवरी 2020 की है जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा पुलिस चौकी और करावल नगर रोड के आसपास नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी थी।

  • हिंसक भीड़ का तांडव: उग्र भीड़ ने भजनपुरा और खजूरी खास इलाकों में न सिर्फ दुकानों और रेहड़ी-ठेलों को आग के हवाले किया, बल्कि एक पुलिस बूथ में भी आग लगा दी।

  • पुलिस पर जानलेवा हमला: कानून-व्यवस्था बहाल करने पहुंचे पुलिस अधिकारियों पर भीड़ ने चारों तरफ से भारी पथराव शुरू कर दिया, जिसमें कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए।

  • निषेधाज्ञा का उल्लंघन: पुलिस प्रशासन ने लाउडस्पीकर के जरिए भीड़ को तितर-बितर होने की कड़ी चेतावनी दी थी और इलाके में धारा 144 (निषेधाज्ञा) लागू की थी, लेकिन उपद्रवियों ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

इसके बाद दिल्ली पुलिस ने खजूरी खास थाने में दंगा भड़काने, गैरकानूनी रूप से जमा होने (Unlawful Assembly), लोक सेवकों पर हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

न्यायालय का अहम कानूनी रुख: ‘सामूहिक जिम्मेदारी’

इस केस में बचाव पक्ष (Defense) की ओर से यह दलील दी जा रही थी कि तीनों आरोपियों की व्यक्तिगत तौर पर कोई विशिष्ट भूमिका (Specific Role) जैसे पत्थर मारते हुए सीधे साक्ष्य नहीं हैं। इस दलील को खारिज करते हुए न्यायाधीश प्रवीन सिंह ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की:

“भले ही हर एक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट रूप से कैमरे या बयानों में सामने न आई हो, लेकिन किसी गैरकानूनी जमावड़े (Unlawful Assembly) का सक्रिय सदस्य होना ही उसे उस भीड़ द्वारा किए गए अपराधों के लिए समान रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए काफी है।”

अदालत ने अपने इस फैसले को मजबूत करने के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला दिया, जिसके तहत यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए भी कि भीड़ हिंसक है, उसका हिस्सा बना रहता है, तो ‘संयुक्त संदेहास्पद जिम्मेदारी’ (Joint Liability) के तहत वह भी उतना ही दोषी माना जाएगा।

महत्वपूर्ण तथ्य 

अदालत ने कानूनी पारदर्शिता बरतते हुए यह साफ किया कि पुलिस के पास इन तीनों आरोपियों के खिलाफ कुछ विशिष्ट धाराओं में पर्याप्त सबूत नहीं थे। इसलिए कोर्ट ने इन्हें निम्नलिखित आरोपों से बरी (Acquit) कर दिया:

  1. आगजनी और तोड़फोड़: हालांकि दुकानों और पुलिस बूथ को जलाया गया था, लेकिन सीधे तौर पर इन तीनों आरोपियों द्वारा आग लगाने के पुख्ता सबूत (जैसे वीडियो या चश्मदीद) नहीं मिले।

  2. घातक हथियार रखना: आरोपियों के पास घटना के वक्त तलवार, कट्टा या अन्य किसी घातक हथियार होने की बात सिद्ध नहीं हो सकी।

नोट: शुरुआती मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस चार्जशीट में इन पर आगजनी और हथियारों की धाराएं भी लगाई गई थीं, लेकिन कड़कड़डूमा कोर्ट ने केवल ‘गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा होने, पुलिस पर पथराव करने और सरकारी ड्यूटी में बाधा डालने’ के आरोपों को ही सिद्ध माना है।

अब आगे क्या?

कड़कड़डूमा अदालत ने तीनों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की प्रासंगिक धाराओं के तहत दोषी मान लिया है। अदालत अब अगली तय तारीख पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दोषियों की सजा की अवधि (Quantum of Sentence) पर अपना अंतिम फैसला सुनाएगी।

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