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डिंडौरी: ₹800 की मदद और इलाज के बदले गरीब परिवार पर धर्म परिवर्तन का दबाव, अब SP से न्याय की गुहार

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मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम और कानून की किताब के साथ कोर्ट का हथौड़ा (प्रतीकात्मक चित्र).

डिंडौरी । शनिवार, 23 मई 2026

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल डिंडौरी जिले के बजाग थाना क्षेत्र से एक बेहद संवेदनशील और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक गरीब ग्रामीण परिवार को संकट के समय दी गई मामूली आर्थिक मदद और बीमारी के इलाज को हथियार बनाकर, उन पर ईसाई धर्म अपनाने का गंभीर दबाव बनाने का आरोप लगा है। जब पीड़ित परिवार ने धर्म बदलने से इनकार किया, तो उन्हें गांव से सामाजिक बहिष्कार और प्रताड़ना की धमकी दी जा रही है। स्थानीय पुलिस की कथित निष्क्रियता के बाद अब न्याय की आस में यह पीड़ित परिवार पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय के चक्कर काट रहा है।

बीमारी का फायदा उठाकर बुना गया जाल

यह पूरा मामला बजाग थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम तांतर (पंचायत चाड़ा) का है। पीड़ित ग्रामीण राकेश कुमार बोरकर ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर आपबीती सुनाई। राकेश के मुताबिक, कुछ समय पहले उनकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार थीं। गरीबी और लाचारी के बीच, गांव के ही चर्च से जुड़े एक व्यक्ति बाहमन सिंह मांडले ने उनकी मदद की। बाहमन सिंह ने पत्नी के इलाज के नाम पर राकेश को करीब ₹800 की आर्थिक सहायता दी थी।

पीड़ित परिवार को लगा कि यह संकट के समय मिली मानवीय मदद है, लेकिन आरोप है कि इस छोटी सी मदद के पीछे एक सोची-समझी साजिश छिपी थी। मदद करने के कुछ ही समय बाद आरोपी बाहमन सिंह द्वारा राकेश और उसके परिवार पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव बनाया जाने लगा।

प्रलोभन से शुरू हुआ सफर, धमकी पर आकर रुका

शिकायत के अनुसार, आरोपी ने पीड़ित को लालच दिया कि यदि वह और उसका परिवार ईसाई धर्म स्वीकार कर लेते हैं, तो उनके घर की माली हालत (आर्थिक स्थिति) को पूरी तरह सुधार दिया जाएगा और बीमार पत्नी का देश के बेहतर से बेहतर अस्पताल में मुफ्त इलाज कराया जाएगा।

शुरुआती दबाव और प्रलोभन के कारण राकेश कुमार बोरकर करीब दो से तीन महीने तक चर्च में आयोजित होने वाली विभिन्न धार्मिक प्रार्थनाओं और कार्यक्रमों में शामिल होते रहे। लेकिन धीरे-धीरे जब उन्हें अहसास हुआ कि उनके मूल विश्वास और संस्कृति को बदलने का प्रयास किया जा रहा है, तो उन्होंने अपनी इच्छा से चर्च जाना बंद कर दिया।

राकेश का आरोप है कि जैसे ही उन्होंने चर्च की गतिविधियों से दूरी बनाई, आरोपी और उसके सहयोगियों का रवैया पूरी तरह बदल गया। पीड़ित परिवार पर अब मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का सिलसिला शुरू हो गया। उन्हें सीधे तौर पर धमकी दी गई कि अगर उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार नहीं किया, तो उनका गांव में रहना और जीवन बसर करना मुश्किल कर दिया जाएगा।

पुलिस प्रशासन की सुस्ती और पीड़ित की मजबूरी

इस मामले का एक और चिंताजनक पहलू पुलिस की कार्यशैली से जुड़ा है। पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने इस पूरी प्रताड़ना और धमकी की शिकायत सबसे पहले स्थानीय बजाग थाना पुलिस से की थी। लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया और आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस या सख्त कदम नहीं उठाया। स्थानीय पुलिस की इस ढुलमुल नीति के कारण आरोपियों के हौसले और बुलंद हो गए और पीड़ित परिवार का जीना दूभर हो गया।

अंततः, स्थानीय स्तर पर सुनवाई न होने से निराश होकर राकेश बोरकर अपने परिवार के साथ डिंडौरी एसपी कार्यालय पहुंचे और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने न्याय की गुहार लगाई।

कानून क्या कहता है और अब आगे क्या?

मध्य प्रदेश में जबरन, डरा-धमकाकर या किसी भी तरह का आर्थिक/चिकित्सकीय प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना ‘मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ (MP Freedom of Religion Act) के तहत एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है। इस कानून के तहत किसी लाचारी का फायदा उठाकर धर्मांतरण कराने पर कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

नवीनतम अपडेट: एसपी कार्यालय में मामले की गूंज के बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने इस पर संज्ञान लिया है। पुलिस प्रशासन की ओर से आधिकारिक बयान आया है कि शिकायत दर्ज कर ली गई है और बजाग थाना पुलिस को मामले की निष्पक्ष व त्वरित जांच के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस का कहना है कि जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर आरोपियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस घटना ने एक बार फिर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय उन तत्वों को बेनकाब किया है जो गरीबी और बीमारी को धर्मांतरण का जरिया बनाते हैं। अब देखना यह होगा कि डिंडौरी पुलिस इस गरीब परिवार को कितनी जल्दी न्याय और सुरक्षा मुहैया करा पाती है।

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