नई दिल्ली. पश्चिम एशिया (West Asia) में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के निधन और उसके बाद इजरायल-ईरान के बीच शुरू हुए सीधे सैन्य टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। इस गंभीर स्थिति के बीच, भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Masoud Pezeshkian) से टेलीफोन पर लंबी बातचीत की।
दोनों नेताओं के बीच यह संवाद ऐसे समय में हुआ है जब लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यापारिक जहाजों पर हमले बढ़ गए हैं।
1. बिगड़ते हालात पर पीएम मोदी की गहरी चिंता
प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति के साथ बातचीत में नागरिकों की सुरक्षा और नागरिक बुनियादी ढांचे को हो रहे नुकसान पर दुख जताया। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत क्षेत्र में शांति का पक्षधर है। उन्होंने ‘एक्स’ (Twitter) पर साझा किया:
“राष्ट्रपति पेजेशकियन के साथ क्षेत्रीय स्थिति पर सार्थक चर्चा हुई। मैंने तनाव कम करने और संवाद व कूटनीति के जरिए समाधान निकालने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।”
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2. ‘स्ट्रेथ ऑफ होर्मुज’ और भारत की ऊर्जा सुरक्षा
भारत के लिए यह युद्ध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक चुनौती भी है।
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ऊर्जा की लाइफलाइन: भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। Strait of Hormuz में किसी भी तरह की रुकावट से भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
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समुद्री सुरक्षा: हाल ही में व्यापारिक जहाजों पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद भारतीय नौसेना ने अरब सागर में अपनी गश्त बढ़ा दी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि भारतीय क्रू मेंबर्स और जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
3. ईरान में फंसे 9,000 भारतीयों का क्या होगा?
विदेश मंत्रालय (MEA) के आंकड़ों के अनुसार, ईरान में फिलहाल लगभग 9,000 भारतीय नागरिक हैं। इनमें बड़ी संख्या में छात्र, डॉक्टर, इंजीनियर और तीर्थयात्री शामिल हैं।
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भारत सरकार ने तेहरान स्थित भारतीय दूतावास को हाई अलर्ट पर रखा है।
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किसी भी आपात स्थिति में ‘निकासी योजना’ (Evacuation Plan) तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं।
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4. पड़ोसी देशों की उम्मीद: भारत बना ‘संकटमोचक’
दिलचस्प बात यह है कि इस संकट के बीच भारत के पड़ोसी देशों—बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव—ने भारत से पेट्रोलियम उत्पादों की अतिरिक्त आपूर्ति की मांग की है।
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फ्रेंडशिप पाइपलाइन: भारत पहले से ही ‘इंडिया-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन’ के जरिए डीजल भेज रहा है।
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रणनीतिक भंडार: भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपने पड़ोसियों की मदद करेगा, लेकिन पहले अपनी घरेलू रिफाइनिंग क्षमता और स्टॉक का आकलन करेगा।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन (खामेनेई के बाद) और इजरायल के कड़े रुख ने भारत को एक ‘टाइटरोप वॉक’ (संतुलन बनाने की चुनौती) पर खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में भारत संयुक्त राष्ट्र (UN) में भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपना सकता है।
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