देहरादून | गुरुवार, 16 अप्रैल 2026
उत्तराखंड की पावन धरती, जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर अपनी पौराणिक विरासत को लेकर चर्चा में है। चंपावत जिले के सुप्रसिद्ध मानेश्वर मंदिर परिसर में चल रहे जीर्णोद्धार कार्य के दौरान जमीन के भीतर से पांच प्राचीन शिवलिंग प्राप्त हुए हैं। इस खोज के बाद पूरे क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का माहौल है, वहीं इतिहासकार इसे क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता से जोड़कर देख रहे हैं।
खुदाई में कैसे मिले ‘महादेव’?
जानकारी के अनुसार, मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण और भूमि समतलीकरण का कार्य चल रहा था। इसी दौरान श्रमिकों को जमीन के नीचे पत्थर की कुछ ठोस आकृतियां महसूस हुईं। जब सावधानी से खुदाई की गई, तो एक के बाद एक पांच पत्थर के शिवलिंग निकले। ये शिवलिंग प्राचीन शैली में तराशे गए हैं और वर्षों से जमीन के अंदर दबे होने के बावजूद सुरक्षित अवस्था में हैं।
क्या है पांडव काल और चंद वंश का कनेक्शन?
स्थानीय ग्रामीणों और मंदिर समिति के सदस्यों का मानना है कि इन शिवलिंगों का सीधा संबंध महाभारत काल से है। जनश्रुतियों के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास और वनवास के दौरान कुमाऊं की पहाड़ियों में काफी समय बिताया था और भगवान शिव की आराधना के लिए शिवलिंगों की स्थापना की थी।
वहीं, कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह क्षेत्र चंद वंश के राजाओं की राजधानी रहा है। चंपावत में पहले भी चंद शासन काल (12वीं-13वीं शताब्दी) के कई शिवलिंग और मंदिर अवशेष मिल चुके हैं। माना जाता है कि चंद शासक शिव के परम भक्त थे और उन्होंने क्षेत्र में ‘सप्त श्वर’ (सात महादेव मंदिर) की स्थापना की थी, जिनमें से मानेश्वर एक प्रमुख केंद्र है।
पुरातत्व विभाग की टीम करेगी वैज्ञानिक जांच
प्रशासन ने घटना की गंभीरता को देखते हुए खुदाई स्थल को सुरक्षा प्रदान की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और स्थानीय विशेषज्ञों को सूचित कर दिया गया है।
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प्रारंभिक जांच: प्रारंभिक तौर पर शिवलिंगों की बनावट को काफी पुराना बताया जा रहा है।
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वैज्ञानिक परीक्षण: विशेषज्ञों का कहना है कि पत्थर की बनावट और नक्काशी की शैली का अध्ययन करने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ये शिवलिंग 5000 साल पुराने ‘पांडव काल’ के हैं या चंद शासन काल के।
श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब
जैसे ही पांच शिवलिंगों के मिलने की खबर फैली, आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज से भी श्रद्धालु मंदिर पहुंचने लगे हैं। लोग इसे ‘महादेव का साक्षात्कार’ मानकर भजन-कीर्तन और दुग्धाभिषेक कर रहे हैं। मंदिर समिति ने फिलहाल इन शिवलिंगों को सुरक्षित स्थान पर प्रतिष्ठित किया है।
निष्कर्ष: > मानेश्वर मंदिर में हुई यह खोज न केवल धार्मिक आस्था का विषय है, बल्कि उत्तराखंड के अनसुलझे इतिहास को समझने की एक नई कड़ी भी साबित हो सकती है। अब सभी को पुरातत्व विभाग की विस्तृत रिपोर्ट का इंतजार है, जो इन शिवलिंगों के असली रहस्य से पर्दा उठाएगी।
Matribhumisamachar


