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NLU के छात्र अपनी जड़ों से कटे, उन्हें मिलनी चाहिए मनुस्मृति और अर्थशास्त्र की शिक्षा: जस्टिस धर्माधिकारी

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
3 Min Read

मुंबई। सोमवार, 27 अप्रैल 2026

बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सत्यरंजन धर्माधिकारी ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) की मौजूदा शिक्षा प्रणाली पर एक बड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि आज के कानून के छात्र अपनी सांस्कृतिक और भारतीय जड़ों से पूरी तरह कट चुके हैं। जस्टिस धर्माधिकारी के अनुसार, कानूनी शिक्षा में केवल विदेशी सिद्धांतों को पढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि छात्रों को भारतीय मूल्यों और प्राचीन ग्रंथों की भी जानकारी होनी चाहिए।

पश्चिमी प्रभाव पर जताई चिंता

एक कार्यक्रम के दौरान बोलते हुए जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि वर्तमान में एनएलयू के छात्र जिस तरह से शिक्षित हो रहे हैं, वे भारतीय समाज की वास्तविकताओं और यहाँ की न्याय परंपरा को समझने में पीछे रह जाते हैं। उन्होंने जोर दिया कि वकीलों और न्यायाधीशों के लिए यह समझना जरूरी है कि भारत का अपना एक समृद्ध न्यायशास्त्र (Jurisprudence) रहा है।

मनुस्मृति और अर्थशास्त्र की वकालत

जस्टिस धर्माधिकारी ने सुझाव दिया कि कानून के पाठ्यक्रम में निम्नलिखित विषयों को शामिल किया जाना चाहिए:

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मनुस्मृति: सामाजिक अनुशासन और प्राचीन न्याय व्यवस्था के अध्ययन के लिए।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र: शासन व्यवस्था, नीति और प्रशासनिक न्याय को समझने के लिए।
भारतीय मूल्य: छात्रों में समाज के प्रति सहानुभूति और नैतिक जिम्मेदारी विकसित करने के लिए।

कानूनी शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ पर बहस

जस्टिस धर्माधिकारी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में कानूनी शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। उनके समर्थकों का मानना है कि इससे न्याय प्रणाली में अधिक संवेदनशीलता आएगी, जबकि आलोचक आधुनिक संवैधानिक मूल्यों और पुराने ग्रंथों के बीच के टकराव की ओर इशारा करते हैं।

“कानून की शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा को समझने के लिए होनी चाहिए।” – जस्टिस धर्माधिकारी

निष्कर्ष:

जस्टिस धर्माधिकारी के इस सुझाव ने कानूनी और शैक्षणिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। क्या प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक कानून के साथ जोड़ना आज के समय की मांग है? यह आने वाले समय में नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा सवाल होगा।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।