चेन्नई । गुरुवार, 21 मई 2026
मद्रास हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक बेहद संवेदनशील जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से जवाब तलब किया है। वकील वासुकी द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि हाल ही में संपन्न हुए 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा वोटर्स को लुभाने के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया गया और बड़े पैमाने पर नकदी बांटी गई।
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग के वकील को इस विषय पर कड़े निर्देश लेने और जांच कर जवाब दाखिल करने को कहा है।
कोर्ट का बड़ा सवाल: क्या राजनीतिक दल को अयोग्य ठहराया जा सकता है?
इस सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण और बुनियादी कानूनी सवाल उठाया। कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा:
“प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 के तहत चुनाव में भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practices) के लिए किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार को तो अयोग्य ठहराया जा सकता है, लेकिन क्या इसके आधार पर किसी पूरी राजनीतिक पार्टी को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जा सकता है?”
आमतौर पर कानून की धारा 123 (भ्रष्ट आचरण) और धारा 100 (चुनाव शून्य घोषित करने के आधार) के तहत कार्रवाई केवल जीते हुए उम्मीदवारों के खिलाफ ‘इलेक्शन पिटीशन’ के जरिए होती है। ऐसे में पूरी पार्टी को इसके दायरे में लाना एक नई कानूनी बहस को जन्म देता है।
🔍 मामले के मुख्य आरोप और तथ्य
याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में मुख्य रूप से नवनिर्मित पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के साथ-साथ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) जैसी स्थापित पार्टियों पर भी चुनावी शुचिता से समझौता करने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
-
बच्चों का भावनात्मक इस्तेमाल: याचिका में विशेष रूप से 21 अप्रैल को चेन्नई के YMCA ग्राउंड्स में हुई एक पब्लिक मीटिंग का जिक्र किया गया है। आरोप है कि TVK के अध्यक्ष विजय ने बच्चों से अपील की थी कि वे अपने माता-पिता और दादा-दादी पर अपनी पसंद के अनुसार वोट देने का भावनात्मक दबाव बनाएं।
-
दिशानिर्देशों का उल्लंघन: याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग के 2009, 2013, 2014 और 2017 के पुराने सर्कुलर्स का हवाला दिया, जिसमें चुनावी रैलियों, कैंपेनिंग या किसी भी राजनीतिक गतिविधि में नाबालिग बच्चों के शामिल होने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है।
-
कैश-फॉर-वोट का मुद्दा: TVK के अलावा, याचिका में मायलापुर, अलंगुलम और थिरुमंगलम जैसे कई विधानसभा क्षेत्रों का नाम लेते हुए आरोप लगाया गया है कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए भारी मात्रा में नकदी बांटी गई, जिस पर चुनाव आयोग ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
💡 महत्वपूर्ण तथ्य
आपके द्वारा साझा किए गए विवरण में कुछ तकनीकी और तथ्यात्मक बिंदु हैं जिन्हें कानूनी और व्यावहारिक संदर्भ में स्पष्ट करना आवश्यक है:
-
मुख्यमंत्री पद की स्थिति (CM Post Clarification): याचिका में विजय को “मौजूदा मुख्यमंत्री” (Current Chief Minister) के रूप में संदर्भित करने की बात कही गई है। हालांकि, तमिलनाडु में मुख्य राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक पदों की वास्तविक स्थिति को देखते हुए यह कानूनी रूप से चुनाव परिणामों के बाद पार्टी की वास्तविक स्थिति और ईसीआई के रिकॉर्ड के अधीन है।
-
सेक्शन 100 और 123 का दायरा: जैसा कि कोर्ट रूम में मौजूद वकीलों ने भी ध्यान दिलाया, रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1951 की धारा 100 और 123 के तहत किसी ‘पॉलिटिकल पार्टी’ को सीधे अयोग्य (Disqualify) करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसके तहत केवल व्यक्तिगत उम्मीदवारों का चुनाव रद्द किया जा सकता है। किसी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द (Deregister) करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास कुछ बेहद सीमित और अलग दिशानिर्देशों (जैसे संविधान के प्रति निष्ठा न रखना या धोखाधड़ी से रजिस्ट्रेशन कराना) के तहत ही होता है।
अदालत ने अब इस मामले को पूरी तरह खारिज न करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिए हैं कि वे इन आरोपों पर आंतरिक रूप से निर्देश प्राप्त करें और स्थिति स्पष्ट करें।
Matribhumisamachar


