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केरल में मुस्लिम महिलाओं की स्वतंत्रता पर पाबंदी? मौलाना अब्दुल हमीद फैजी के बयान पर छिड़ा राष्ट्रव्यापी विवाद

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तिरुवनंतपुरम | रविवार, 17 मई 2026

केरल में महिलाओं के सामाजिक और व्यावसायिक जीवन को लेकर दिए गए एक बयान के बाद वैचारिक और सामाजिक टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। समस्त केरल जम-इय्यतुल उलेमा (EK गुट) के युवा संगठन, समस्त युवजन संघम (SYS) के वरिष्ठ नेता मौलाना अब्दुल हमीद फैजी अम्बालाकादावु द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए विचारों ने आधुनिक समाज और महिला अधिकारों से जुड़ी एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

इस बयान को कई हलकों में ‘फतवे’ जैसी कड़क हिदायत के तौर पर देखा जा रहा है, जिसकी चौतरफा आलोचना हो रही है।

क्या है पूरा मामला और मौलाना का फेसबुक पोस्ट?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब मौलाना अब्दुल हमीद फैजी ने अपने आधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर एक विस्तृत पोस्ट साझा की। इस पोस्ट में उन्होंने आधुनिक दौर में मुस्लिम महिलाओं की बदलती जीवनशैली और विभिन्न क्षेत्रों में उनकी बढ़ती भागीदारी पर कड़ा ऐतराज जताया है।

उन्होंने अपने पोस्ट में पैगंबर मोहम्मद के एक कथित कथन (हदीस) का हवाला देते हुए लिखा कि भविष्य में एक ऐसा समय आएगा जब लोगों को जमीन निगल जाएगी, इंसान जानवरों की शक्ल में बदल जाएंगे और आसमान से पत्थरों की बारिश होगी। जब उनके साथियों ने पूछा कि ऐसा कब होगा, तो नबी ने कहा था— “जब गाने वाली औरतें, संगीत के उपकरण, मंचीय कार्यक्रम आम हो जाएंगे और शराब हर जगह फैल जाएगी।”

मौलाना फैजी की मुख्य आपत्तियां:

  • व्यावसायिक भूमिकाओं पर रोक: मौलाना ने महिलाओं के रिसेप्शनिस्ट बनने, एंकरिंग करने, स्कूलों और शादियों में गाना गाने और स्टेज पर प्रदर्शन करने को पूरी तरह गैर-इस्लामी बताया।

  • सोशल मीडिया पर सक्रियता: उन्होंने मुस्लिम बेटियों के यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय होने की आलोचना की।

  • गैर-महरम पुरुषों से संपर्क: उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं का गैर-महरम पुरुषों (जिनसे खून का रिश्ता या निकाह न हुआ हो) से हाथ मिलाना, उन्हें गले लगाना या मंच से संबोधित करना शर्मनाक है।

  • अतीत का हवाला: मौलाना ने 50 साल पहले का उदाहरण देते हुए कहा कि तब महिलाएं पर्दा न होने पर छाते की ओट में चेहरा छिपा लेती थीं, लेकिन आज की पीढ़ी मुजाहिद और जमात जैसे सुधारवादी समूहों के प्रभाव में आकर भटक गई है।

महत्वपूर्ण तथ्य

पुरानी कड़वाहटों का संदर्भ: यह केरल में इस तरह का पहला विवाद नहीं है। साल 2022 में भी समस्ता के एक वरिष्ठ विद्वान एम.टी. अब्दुल्ला मुसलियार ने एक कक्षा 10 की छात्रा को मंच पर पुरस्कार लेने के लिए बुलाए जाने पर आपत्ति जताई थी। आलोचकों का कहना है कि यह बयान उसी पुरानी रूढ़िवादी सोच का विस्तार है।

आलोचकों ने उठाए गंभीर सवाल: पिछड़ेपन की ओर ले जाने की कोशिश?

मौलाना के इस बयान के बाद केरल के बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और प्रगतिशील मुस्लिम समूहों ने इसकी तीखी निंदा की है। आलोचकों का कहना है कि यह सोच महिलाओं को प्रगतिशील समाज से काटकर पुनः मध्यकाल की ओर धकेलने जैसी है।

आलोचकों के अनुसार, जिस केरल ने देश को सबसे अधिक साक्षरता दर और महिला सशक्तिकरण के बेहतरीन मॉडल दिए हैं, वहाँ इस तरह की रूढ़िवादी प्रवृत्तियां समाज के विकास की गति को धीमा कर सकती हैं। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने महिलाओं को नेतृत्व और रोजगार के अवसर दिए, वे आर्थिक रूप से अधिक मजबूत और समृद्ध बने हैं।

निष्कर्ष

यह विवाद इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि 21वीं सदी के लोकतांत्रिक और आधुनिक भारत में जहां महिलाएं अंतरिक्ष से लेकर सैन्य मोर्चों तक देश का नाम रोशन कर रही हैं, वहीं कुछ रूढ़िवादी ताकतें आज भी उन्हें चहारदीवारी के भीतर सीमित देखना चाहती हैं। मजहबी व्याख्याओं और आधुनिक मानवीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बने, यह आज के समय का सबसे बड़ा सवाल है।

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