नई दिल्ली | शुक्रवार 17 अप्रैल, 2026
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर एक ऐतिहासिक रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि UCC को किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने इसे एक ‘संवैधानिक आकांक्षा’ (Constitutional Aspiration) करार दिया है, जिसका उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करना है।
महिलाओं के हक में बड़ी पहल: क्या है पूरा विवाद?
यह मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन अधिनियम, 1937 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मुख्य रूप से विरासत और संपत्ति के बंटवारे में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को मुद्दा बनाया गया है।
याचिका के मुख्य बिंदु:
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भेदभावपूर्ण नियम: मुस्लिम कानून के तहत विरासत में महिलाओं को पुरुषों (भाइयों या बेटों) की तुलना में आधा हिस्सा मिलता है।
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समानता का उल्लंघन: यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव की मनाही) के खिलाफ है।
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असंहिताबद्ध कानून: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की तरह मुस्लिम उत्तराधिकार नियम संहिताबद्ध नहीं हैं, जिससे कानूनी अनिश्चितता बनी रहती है।
‘धर्म बनाम संविधान’: कोर्ट रूम में तीखी बहस
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि संपत्ति का उत्तराधिकार एक ‘सिविल मामला’ है। उन्होंने तर्क दिया कि इसे अनुच्छेद 25 के तहत “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” नहीं माना जा सकता।
“विरासत के नियम सामाजिक और नागरिक अधिकारों का हिस्सा हैं, इन्हें धर्म की आड़ में समानता के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता।” — प्रशांत भूषण, वरिष्ठ वकील
सुप्रीम कोर्ट की तीन अहम टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची और पीठ ने कुछ ऐसी बातें कहीं जो भविष्य के कानूनों की दिशा तय कर सकती हैं:
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UCC और धर्म: “UCC का किसी विशेष मजहब से कोई लेना-देना नहीं है। यह संविधान के निर्माताओं द्वारा देखा गया एक सपना और घोषणा है।”
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समान नागरिक व्यवस्था: कोर्ट ने ‘स्पेशल मैरिज एक्ट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि देश में पहले से ही ऐसी व्यवस्थाएं हैं जो धर्मनिरपेक्ष आधार पर काम करती हैं।
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केंद्र को नोटिस: अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्या व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) को संवैधानिक मानकों पर परखा जा सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह मामला केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह Article 44 (समान नागरिक संहिता लागू करने का राज्य का कर्तव्य) को लागू करने की दिशा में सबसे बड़ी न्यायिक सक्रियता मानी जा रही है।
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उत्तराखंड मॉडल: हाल ही में उत्तराखंड द्वारा लागू किए गए UCC के बाद अब राष्ट्रीय स्तर पर इस बहस ने जोर पकड़ लिया है।
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लैंगिक न्याय: अगर कोर्ट विरासत नियमों में बदलाव का आदेश देता है, तो यह देश की करोड़ों महिलाओं के लिए संपत्ति के समान अधिकार सुनिश्चित करेगा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट अब केंद्र सरकार के हलफनामे का इंतजार कर रहा है। अगली सुनवाई में यह तय हो सकता है कि क्या ‘पर्सनल लॉ’ को संविधान के ‘मौलिक अधिकारों’ के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो भारत में समान नागरिक संहिता की नींव आधिकारिक तौर पर रखी जा सकती है।
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