कानपुर | रविवार, 17 मई 2026
गर्मी का मौसम इंसानों के साथ-साथ मवेशियों के लिए भी अत्यधिक चुनौतीपूर्ण होता है। जैसे-जैसे पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है, गाय, भैंस, बकरी और अन्य पालतू पशुओं में हीट स्ट्रेस (Heat Stress/ताप घात), निर्जलीकरण (Dehydration) और चयापचय (Metabolism) से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इसका सीधा और नकारात्मक असर पशुओं की शारीरिक सेहत, प्रजनन क्षमता, दूध उत्पादन और कार्यक्षमता पर पड़ता है।
पशुपालकों के लिए यह केवल संवेदनशीलता का नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी विषय है। आइए गर्मियों में पशुओं की वैज्ञानिक और विशेष देखभाल के सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
1. पशुओं पर गर्मी और हीट स्ट्रेस का जैविक प्रभाव
जब वायुमंडलीय तापमान पशु के शरीर के सामान्य तापमान से अधिक हो जाता है, तो पशु अपने शरीर की अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकालने में असमर्थ होने लगते हैं। इसे थर्मोरेगुलेटरी विफलता (Thermoregulatory Failure) कहा जाता है।
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दूध उत्पादन में गिरावट: अत्यधिक गर्मी के कारण पशुओं के शरीर में ‘प्रोलैक्टिन’ और अन्य हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे दूध उत्पादन में 20% से 40% तक की कमी आ सकती है। दूध में फैट (एसएनएफ) की मात्रा भी घट जाती है।
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प्रजनन क्षमता पर असर: हीट स्ट्रेस के कारण मादा पशु समय पर ‘गर्मी’ (Heat) में नहीं आतीं या उनका गर्भधारण विफल हो जाता है। सांडों और भैंसों में शुक्राणुओं की गुणवत्ता खराब हो जाती है।
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प्रतिरोधक क्षमता में कमी: तनाव के कारण पशुओं की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है, जिससे वे थनैला (Mastitis), खुरपका-मुंहपका (FMD) और पेट के कीड़ों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
2. जल प्रबंधन: केवल पानी नहीं, ‘स्वच्छ और शीतल’ जल
गर्मी में पशुओं के शरीर से श्वसन और पसीने के माध्यम से पानी की मात्रा तेजी से कम होती है। एक दुधारू गाय या भैंस को गर्मियों में प्रतिदिन 80 से 100 लीटर पानी की आवश्यकता हो सकती है।
मुख्य रणनीतियाँ:
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24 घंटे उपलब्धता: पशुओं के सामने हर समय साफ पानी होना चाहिए। यदि पानी केवल सुबह-शाम दिया जाएगा, तो दोपहर में पशु गंभीर निर्जलीकरण का शिकार हो सकते हैं।
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तापमान नियंत्रण: पानी की टंकियों को सीधी धूप से बचाएं। टंकियों के ऊपर छप्पर या छांव की व्यवस्था करें। दोपहर में यदि पानी गर्म हो जाए, तो उसे बदलकर ताजा भूमिगत पानी (सबरसिबल या हैंडपंप का) भरें।
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इलेक्ट्रोलाइट्स का मिश्रण: अत्यधिक गर्मी के दिनों में पानी में थोड़ा नमक (नियमित और काला नमक), मीठा सोडा (सोडियम बाइकार्बोनेट) या कमर्शियल ओरल रीहाइड्रेशन साल्ट (ORS) मिलाएं। यह शरीर में लवणों के संतुलन को बनाए रखता है।
3. पशुशाला (शेड) का वैज्ञानिक प्रबंधन
पशुओं का आवास ऐसा होना चाहिए जो उन्हें लू (गर्म हवाओं) और सौर विकिरण (Solar Radiation) से पूरी तरह बचा सके।
| मापदंड | आदर्श व्यवस्था |
| छत की बनावट | कंक्रीट या टिन की छतों के नीचे गर्मी बहुत बढ़ती है। छत पर 4-6 इंच मोटी घास, फूस या पुआल की परत डालें। यदि मुमकिन हो, तो छत को सफेद चूने से पेंट करें (यह सूरज की किरणों को परावर्तित करता है)। |
| ऊंचाई और हवा | शेड की ऊंचाई कम से कम 10-12 फीट होनी चाहिए। पूरब-पश्चिम दिशा में खुला शेड हवा के प्राकृतिक बहाव (Cross Ventilation) के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। |
| कूलिंग सिस्टम | शेड के भीतर सीलिंग फैन या फॉगर्स (पानी की महीन बूंदें छिड़कने वाले फव्वारे) लगाएं। ध्यान रहे, फॉगर्स चलते समय पंखे भी चलें ताकि नमी हवा में न रुके, अन्यथा उमस (Humidity) बढ़ जाएगी। |
| टाट के बोरे | शेड के खुले हिस्सों पर जूट या टाट के बोरे लटकाएं और उन पर दोपहर के समय पानी छिड़कते रहें। यह ‘डेजर्ट कूलर’ की तरह काम करता है और लू को भीतर आने से रोकता है। |
4. आहार प्रबंधन में बदलाव (Feed Modification)
गर्मियों में पशु चारा खाना कम कर देते हैं (Dry Matter Intake घट जाता है) क्योंकि पाचन प्रक्रिया से शरीर में आंतरिक गर्मी (Heat Increment) पैदा होती है। इसलिए, कम मात्रा में अधिक पोषण देना जरूरी है।
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खिलाने का समय बदलें: दोपहर के सख्त पहर में पशुओं को भारी चारा देने से बचें। उन्हें भोजन सुबह जल्दी (भोर में) और रात के ठंडे समय में दें। रात के समय मवेशी कुल डाइट का 60-70% हिस्सा आसानी से पचा सकते हैं।
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हरे चारे की प्रधानता: सूखे भूसे की मात्रा कम करें और रसीले व पाचक चारे जैसे- बरसीम, मक्का, जई, या सूडान घास की मात्रा बढ़ाएं। हरा चारा पानी की कमी को भी पूरा करता है।
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पशु आहार (कंसंट्रेट) और बाईपास फैट: चारे में ऊर्जा की सघनता बढ़ाने के लिए अनाज और खली की मात्रा संतुलित करें। उच्च उत्पादकता वाले पशुओं को ‘बाईपास फैट’ और खनिज मिश्रण (Mineral Mixture) अनिवार्य रूप से दें।
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फफूंद से बचाव: गर्मियों में नमी और गर्मी के कारण भीगे हुए दाने या चारे में ‘अफ़लाटॉक्सिन’ (Aflatoxin) नामक फफूंद जल्दी लगती है। हमेशा सूखा और फंगस-मुक्त आहार ही परोसें।
5. पानी का छिड़काव और स्नान की सही तकनीक
पशुओं को ठंडा रखने का सबसे त्वरित तरीका बाह्य वाष्पीकरण (Evaporative Cooling) है।
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भैंसों के लिए विशेष ध्यान: भैंसों की त्वचा काली और मोटी होती है और उनमें पसीने की ग्रंथियां (Sweat glands) गायों की तुलना में बहुत कम होती हैं। इसलिए उन्हें गर्मी ज्यादा लगती है। उन्हें दिन में कम से कम 2 से 3 बार अच्छी तरह नहलाएं या किसी साफ तालाब में 1-2 घंटे के लिए छोड़ें।
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गायों के लिए: गायों (विशेषकर जर्सी या एचएफ जैसी विदेशी/संकर नस्लों) की पीठ और गर्दन पर दिन में तीन बार पानी का छिड़काव करें।
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समय का चयन: दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच का समय नहलाने के लिए सबसे उत्तम है। कभी भी एकदम कड़क धूप से आए पशु पर तुरंत ठंडा पानी न डालें, पहले उसे 15 मिनट छांव में सुस्ताने दें।
6. हीट स्ट्रेस (ताप घात) के प्रमुख लक्षण और प्राथमिक उपचार
एक सजग पशुपालक को हीट स्ट्रेस के शुरुआती लक्षणों की पहचान होनी चाहिए ताकि स्थिति गंभीर होने से रोकी जा सके:
[शुरुआती लक्षण: सुस्ती और कम खाना]
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[मध्यम लक्षण: मुंह खोलकर हांफना और अत्यधिक लार (Drooling) गिरना]
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[गंभीर लक्षण: आंखें लाल होना, चक्कर खाकर गिरना, शरीर का तापमान 106°F पार होना]
आपातकालीन प्राथमिक उपचार:
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पीड़ित पशु को तुरंत सबसे ठंडी और हवादार जगह पर शिफ्ट करें।
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उसके पूरे शरीर, विशेषकर सिर और छाती पर लगातार ठंडा पानी डालें।
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बर्फ या ठंडे पानी की पट्टियां सिर पर रखें।
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पशु के पैर और थनों को ठंडे पानी में डुबोकर रखें।
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यदि पशु होश में हो, तो उसे ग्लूकोज, नमक और मीठे सोडे का घोल पिलाएं।
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तुरंत नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सक को सूचित करें ताकि वे अंतःशिरा (Intravenous) फ्लूइड्स और एंटीपायरेटिक दवाएं दे सकें।
निष्कर्ष
गर्मियों के ये 3-4 महीने डेयरी व्यवसाय के लिए परीक्षा की घड़ी होते हैं। पशु प्रबंधन में की गई जरा सी लापरवाही न केवल पशु को बीमार कर सकती है, बल्कि पशुपालक को भारी आर्थिक नुकसान में डाल सकती है। सुबह-शाम चराना, शेड को ठंडा रखना, साफ व ठंडे पानी की निरंतर आपूर्ति और संतुलित पोषण जैसे वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर हीट स्ट्रेस को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। याद रखें, एक आरामदायक और तनाव-मुक्त वातावरण में ही पशु अपनी पूरी क्षमता से दूध उत्पादन कर सकता है।
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