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सेंट स्टीफंस कॉलेज और दिल्ली यूनिवर्सिटी में आर-पार: शिक्षक भर्ती से लेकर प्रिंसिपल की नियुक्ति तक, समझें पूरा कानूनी व प्रशासनिक विवाद

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नई दिल्ली । बुधवार, 20 मई 2026

दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) से संबद्ध प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज एक बार फिर बड़े प्रशासनिक और विधिक विवादों के केंद्र में है। कॉलेज में हाल ही में की गई 25 सहायक प्रोफेसरों (Assistant Professors) की स्थायी नियुक्तियों और कॉलेज इतिहास की पहली महिला प्रिंसिपल प्रो. सुसान एलियास (Susan Elias) की नियुक्ति को लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी और कॉलेज प्रशासन के बीच टकराव चरम पर पहुंच गया है। दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi HC) द्वारा शिक्षक नियुक्तियों पर अंतरिम रोक लगाने और दिल्ली यूनिवर्सिटी द्वारा प्रिंसिपल की नियुक्ति प्रक्रिया को रोकने के कड़े निर्देशों ने इस विवाद को देश के सबसे बड़े शैक्षणिक व संवैधानिक बहसों में से एक बना दिया है।

1. शिक्षक नियुक्तियां: 25 में से 16 ईसाई शिक्षकों की भर्ती पर क्यों मचा बवाल?

विवाद की शुरुआत सेंट स्टीफंस कॉलेज द्वारा 9 मई 2026 को जारी सहायक प्रोफेसरों की चयन सूची के बाद हुई। कॉलेज प्रशासन ने 25 अनारक्षित (Unreserved) पदों पर नियुक्तियां कीं, जिनमें से 16 उम्मीदवार ईसाई/अल्पसंख्यक समुदाय से हैं।

इस सूची के सामने आते ही दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) और छात्र संगठनों ने कॉलेज प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। DUTA के अध्यक्ष वीके नेगी ने आरोप लगाया कि कॉलेज में “गैर-ईसाई विरोधी मानसिकता” के तहत काम किया जा रहा है और योग्यता (Merit) को दरकिनार कर धर्म विशेष के लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है।

तदर्थ (Ad-hoc) शिक्षकों को हटाने से फैला आक्रोश

यह मामला केवल नई नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ठीक पहले कॉलेज में साल 2018-2019 से लगातार पढ़ा रहे करीब 12 से 15 तदर्थ (Ad-hoc) शिक्षकों को सेवा से बाहर कर दिया गया। हटाए गए शिक्षकों में से अधिकांश हिंदू समुदाय से हैं। शिक्षकों का आरोप है कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया ताकि मनमाने ढंग से नई नियुक्तियां की जा सकें।

2. भर्ती प्रक्रिया पर प्रशासनिक सवाल और नियमों का उल्लंघन

दिल्ली यूनिवर्सिटी और याचिकाकर्ता शिक्षकों के अनुसार, सेंट स्टीफंस कॉलेज ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान स्थापित शैक्षणिक मानदंडों और UGC गाइडलाइन्स की सरेआम अनदेखी की:

  • शॉर्टलिस्टिंग के नियमों में विसंगति: दिल्ली यूनिवर्सिटी की गाइडलाइंस के मुताबिक, किसी एक अनारक्षित सीट के लिए अधिकतम 40 उम्मीदवारों को ही साक्षात्कार (Interview) के लिए शॉर्टलिस्ट किया जा सकता है। इसके विपरीत, सेंट स्टीफंस ने प्रति सीट लगभग 70 उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया।

  • योग्यता से समझौते का आरोप: हाई कोर्ट में दायर याचिका में शिक्षकों ने कहा कि शॉर्टलिस्टिंग का दायरा इतना बड़ा करने से ‘कट-ऑफ’ स्तर नीचे गिर गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि कम शैक्षणिक स्कोर (Academic Scores) और कम शिक्षण अनुभव वाले पसंदीदा उम्मीदवारों को साक्षात्कार में शामिल कर फायदा पहुंचाया जा सके। इसके कारण लंबे समय से पढ़ा रहे उच्च शिक्षित और अनुभवी शिक्षक बराबरी के अवसर से वंचित रह गए।

3. दिल्ली हाई कोर्ट का हस्तक्षेप: तदर्थ शिक्षकों को बड़ी अंतरिम राहत

कॉलेज से निकाले गए प्रभावित विभागों (जैसे- दर्शनशास्त्र, संस्कृत, अंग्रेजी, हिंदी और भौतिकी) के शिक्षकों ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया।

13 मई 2026 को न्यायमूर्ति की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कॉलेज प्रशासन को बड़ा झटका दिया। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा:

  1. सेवा समाप्ति पर रोक: याचिकाकर्ता शिक्षक कई वर्षों से कॉलेज में पढ़ा रहे हैं और पहली नजर में उनका पक्ष मजबूत है, इसलिए अगली सुनवाई तक उनकी सेवाएं समाप्त नहीं की जाएंगी।

  2. सिफारिशों के क्रियान्वयन पर पाबंदी: विज्ञापन के तहत गठित चयन समिति की रिपोर्ट या सिफारिशों को कोर्ट की अनुमति के बिना लागू नहीं किया जाएगा।

अदालत ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और सेंट स्टीफंस कॉलेज को नोटिस जारी कर 6 हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।

4. नया मोर्चा: पहली महिला प्रिंसिपल प्रो. सुसान एलियास की नियुक्ति पर DU की रोक

शिक्षक भर्ती का विवाद थमा भी नहीं था कि 12 मई 2026 को सेंट स्टीफंस कॉलेज की गवर्निंग बॉडी ने कंप्यूटर साइंटिस्ट प्रो. सुसान एलियास को कॉलेज के 145 साल के इतिहास में पहली महिला प्रिंसिपल नियुक्त करने की घोषणा कर दी। वह 1 जून 2026 से वर्तमान प्रिंसिपल प्रो. जॉन वर्गीस की जगह कार्यभार संभालने वाली थीं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की कड़ी आपत्ति

14 मई 2026 को दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलसचिव (Registrar) विकास गुप्ता ने कॉलेज की गवर्निंग बॉडी को पत्र लिखकर इस नियुक्ति प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोकने का निर्देश दिया।

“यह कॉलेज पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है और UGC नियमों के अंतर्गत आता है। नियमों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।” – विकास गुप्ता, कुलसचिव, DU

DU का तर्क है कि प्रिंसिपल चयन के लिए गठित समिति UGC विनियम-2018 (खंड 5.0, उप-खंड 8-ए) के अनुरूप नहीं थी, क्योंकि इसमें विश्वविद्यालय द्वारा नामित विशेषज्ञों और कुलपति (VC) के पैनल को शामिल नहीं किया गया था। इसलिए इस समिति की सिफारिशें अवैध हैं।

5. अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा (Article 30(1)) बनाम यूनिवर्सिटी नियम

यह विवाद असल में सेंट स्टीफंस कॉलेज की ‘प्रशासनिक स्वायत्तता’ (Autonomy) और दिल्ली यूनिवर्सिटी के ‘नियंत्रक अधिकारों’ के बीच दशकों पुरानी वैधानिक लड़ाई का हिस्सा है।

मुख्य बिंदु सेंट स्टीफंस कॉलेज का पक्ष दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) का पक्ष
संविधान का अनुच्छेद 30(1) कॉलेज एक ईसाई अल्पसंख्यक संस्थान है, जिसे संविधान के तहत अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान को स्थापित करने और संचालित करने का मूल अधिकार है। कॉलेज भले ही अल्पसंख्यक संस्थान है, लेकिन वह 95% से अधिक सरकारी/UGC फंडिंग पर चलता है, इसलिए उसे शैक्षणिक मानकों और नियुक्तियों में UGC नियमों का पालन करना होगा।
2008 का हाई कोर्ट का फैसला साल 2008 में वलसन थम्पू की प्रिंसिपल नियुक्ति के समय दिल्ली हाई कोर्ट ने माना था कि चयन समिति के गठन से जुड़े DU के अध्यादेश (Ordinance) अल्पसंख्यक संस्थानों पर बाध्यकारी नहीं हैं। चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। नाम और मजहब के आधार पर अयोग्य लोगों को चुनकर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।

6. कॉलेज का पुराना विवादित इतिहास और वैचारिक दृष्टिकोण

लेख और हालिया इतिहास के अनुसार, सेंट स्टीफंस कॉलेज लगातार अपनी भीतरी संस्कृति और प्रशासनिक फैसलों को लेकर चर्चा में रहा है:

  • धार्मिक असेंबली विवाद (2024): फरवरी 2024 में मॉर्निंग असेंबली में शामिल न होने पर करीब 120 छात्रों को निलंबित करने का ईमेल भेजा गया था, जिस पर छात्र संगठनों ने ‘जबरन धार्मिक शिक्षा’ देने के आरोप लगाए थे। बाद में कॉलेज ने इसे टाइपिंग की गलती बताया था।

  • वैचारिक केंद्र: सेंट स्टीफंस केवल एक कॉलेज नहीं बल्कि देश की राजनीति और मीडिया में लिबरल-वामपंथी इकोसिस्टम तैयार करने का बड़ा केंद्र माना जाता रहा है। राहुल गांधी, शशि थरूर, कपिल सिब्बल जैसे राजनेता और बरखा दत्त, करण थापर जैसे पत्रकार इसी संस्थान की देन हैं, जिसके चलते इसके प्रशासनिक विवादों को अक्सर बड़े वैचारिक संघर्ष के रूप में देखा जाता है।

DUTA अध्यक्ष वीके नेगी ने चेतावनी दी है कि यदि कॉलेज ने यूनिवर्सिटी के नियमों को मानना बंद कर दिया, तो उसकी मान्यता और संबद्धता (Affiliation) खतरे में पड़ सकती है, जिससे यहाँ पढ़ने वाले हजारों छात्र-छात्राओं की डिग्री अमान्य होने का खतरा मंडराने लगेगा।

नोट:

  • भर्ती का पूर्ण स्थगन नहीं: कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द कर दी गई है, जबकि वास्तविकता यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने नियुक्तियों के अंतिम क्रियान्वयन पर ‘अंतरिम रोक’ (Interim Stay) लगाई है और मामला अभी कोर्ट के विचाराधीन है।

  • अल्पसंख्यक अधिकार की व्याख्या: कॉलेज का यह दावा पूरी तरह गलत नहीं है कि उन्हें प्रशासनिक स्वायत्तता है; सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट (2008 फैसला) ने अतीत में उनके प्रशासनिक अधिकारों को संरक्षण दिया है, लेकिन वर्तमान में विवाद इस बात पर है कि क्या प्रशासनिक अधिकार UGC के न्यूनतम योग्यता मानदंडों का उल्लंघन कर सकते हैं।

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