नई दिल्ली | शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी हस्तक्षेप करते हुए रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा को बड़ी राहत प्रदान की है। शीर्ष अदालत ने उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश में चल रही आपराधिक कार्यवाही और निचली अदालत के समन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। फादर परेरा पर आरोप है कि उन्होंने अपनी प्रार्थना सभाओं में ईसाई धर्म को “एकमात्र सच्चा धर्म” बताया था, जिससे अन्य समुदायों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं।
जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ का आदेश
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने पादरी की याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक इस मामले पर विस्तृत सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक निचली अदालत में चल रहा ट्रायल स्थगित रहेगा।
पादरी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को केवल परेशान करने के लिए झूठा फंसाया गया है और उनके बयानों से IPC की धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट का सख्त रुख?
इससे पहले, 18 मार्च 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पादरी की याचिका को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने कहा था:
“भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है जहाँ सभी धर्मों के लोग साथ रहते हैं। किसी भी व्यक्ति या धर्म के लिए यह दावा करना गलत है कि वही एकमात्र ‘सच्चा धर्म’ है। ऐसा कहना प्रत्यक्ष रूप से अन्य धर्मों का अपमान और उन्हें नीचा दिखाने जैसा है।”
हाई कोर्ट ने माना था कि पादरी के बयान प्रथम दृष्टया धारा 295A के दायरे में आते हैं, क्योंकि यह जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला कृत्य हो सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि: धर्मांतरण के आरोपों से शुरू हुई जांच
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FIR और स्थान: यह मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के मुहम्मदाबाद थाने में दर्ज किया गया था।
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आरोप: शिकायत में कहा गया था कि फादर परेरा प्रार्थना सभाओं में बार-बार कहते थे कि केवल ईसाई धर्म ही सच्चा है।
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जांच का मोड़: प्रारंभिक जांच में पुलिस को अवैध धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं मिला था, लेकिन अन्य धर्मों की आलोचना और अपमान के आधार पर पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी थी।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम धर्मनिरपेक्षता की बहस
सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले पर होने वाली सुनवाई देश में “धार्मिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की सीमाएं तय करेगी। कोर्ट को यह तय करना होगा कि क्या अपने धर्म की प्रशंसा करना अनिवार्य रूप से दूसरे धर्म का अपमान माना जाएगा।
यह फैसला न केवल पादरी विनीत परेरा के लिए, बल्कि भारत में धार्मिक प्रचार-प्रसार के कानूनी मानकों के लिए भी एक नजीर (Precedent) साबित होगा।
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