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सबरीमाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी – क्या PIL अब ‘पब्लिसिटी स्टंट’ बन गई है?

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
3 Min Read

नई दिल्ली । मंगलवार, 5 मई 2026

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर वर्षों से चल रही कानूनी लड़ाई में एक नया और महत्वपूर्ण मोड़ आया है। 9 जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में याचिका दाखिल करने वाली संस्था ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन (IYLA)’ की मंशा और साख पर कड़े सवाल उठाए हैं। कोर्ट की टिप्पणियों ने न केवल इस केस, बल्कि भारत में जनहित याचिकाओं (PIL) के भविष्य पर भी बहस छेड़ दी है।

मुख्य बिंदु: कोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?

1. याचिका का आधार और विश्वसनीयता

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि याचिकाकर्ता संस्था के पास इस मामले को उठाने का कोई ठोस आधार नहीं था। जस्टिस सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा कि 2006 में दाखिल यह याचिका केवल मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित थी। कोर्ट के अनुसार, बिना किसी जमीनी शोध या प्रभावित पक्ष की भागीदारी के, केवल खबरों के आधार पर ऐसी याचिकाओं को “कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था।”

2. PIL का बदलता स्वरूप: ‘पॉलिटिकल और पब्लिसिटी इंटरेस्ट’

बेंच की सदस्य जस्टिस बी वी नागरत्ना ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के दौर में PIL (Public Interest Litigation) का असली मतलब बदल गया है। अब यह:

  • पैसा इंटरेस्ट लिटिगेशन

  • पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन

  • पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन कर रह गई है।

कोर्ट ने संकेत दिया कि कई बार लेख केवल इसलिए छपवाए जाते हैं ताकि उनके आधार पर कोर्ट में याचिका दाखिल की जा सके।

3. संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एम एम सुंदरेश ने याचिकाकर्ता संस्था से पूछा कि क्या उन्होंने याचिका दायर करने से पहले कोई आधिकारिक प्रस्ताव (Resolution) पारित किया था? जब वकील इस पर स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए, तो कोर्ट ने इसे “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” करार दिया।

पिछली बेंच के फैसले पर भी चर्चा

सुनवाई के दौरान जब यह तर्क दिया गया कि पूर्व CJI दीपक मिश्रा ने इस मामले को बड़ी बेंच को भेजा था और वकीलों को सुरक्षा प्रदान की थी, तो वर्तमान बेंच ने असहमति जताई। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वकीलों को सुरक्षा देने के बजाय, उस समय याचिका को ही खारिज कर देना चाहिए था, जिससे विवाद ही समाप्त हो जाता।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियाँ दर्शाती हैं कि भविष्य में धार्मिक और संवेदनशील मुद्दों पर PIL दाखिल करना इतना आसान नहीं होगा। कोर्ट अब याचिकाकर्ता के ‘लोकस स्टैंडाई’ (Locus Standi) और उनके वास्तविक हितों की गहराई से जांच करेगा।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।