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सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामला: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरकरार रखा 22 पुलिसकर्मियों को बरी करने का फैसला

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सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले की प्रतीकात्मक तस्वीर।

मुंबई । गुरुवार, 7 मई 2026

भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में से एक, सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत (Special CBI Court) द्वारा 22 पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए उनके खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया है। यह फैसला उन पुलिसकर्मियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो पिछले कई वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

जस्टिस आलोक आराधे और जस्टिस गौतम अंखाड की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ निम्नलिखित हैं:

  • सबूतों का अभाव: कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) पुलिसकर्मियों के खिलाफ साजिश और हत्या के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा।

  • निचली अदालत का विवेक: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेष सीबीआई अदालत ने 2018 में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जो फैसला लिया था, वह पूरी तरह से तर्कसंगत था और उसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

  • पुनर्विचार याचिका खारिज: सोहराबुद्दीन के भाइयों द्वारा दायर की गई याचिकाओं को कोर्ट ने यह कहते हुए नामंजूर कर दिया कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

CBI का रुख और कानूनी पक्ष

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का रुख रहा। CBI ने निचली अदालत के 2018 के फैसले को पहले ही स्वीकार कर लिया था और पुलिसकर्मियों को बरी किए जाने के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की थी। सुनवाई के दौरान भी एजेंसी ने अपना स्टैंड कायम रखा, जिससे बचाव पक्ष का पक्ष और मजबूत हो गया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला साल 2005 का है, जब आरोप लगाया गया था कि गुजरात और राजस्थान पुलिस की एक संयुक्त टीम ने सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी का अपहरण कर एक फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था। बाद में, इस मामले के चश्मदीद गवाह तुलसीराम प्रजापति की भी कथित तौर पर हत्या कर दी गई थी।

इस केस में शुरुआत में 38 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें बड़े राजनेता और उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी शामिल थे। हालांकि, समय के साथ सबूतों की कमी के कारण अमित शाह (तत्कालीन गृह मंत्री, गुजरात) और डीजी वंजारा जैसे बड़े नामों को ट्रायल शुरू होने से पहले ही डिस्चार्ज कर दिया गया था।

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