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धार भोजशाला विवाद: हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला; जानें अब तक के कानूनी घटनाक्रम

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भोपाल । शुक्रवार, 22 मई 2026

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील भोजशाला-कमाल मौला परिसर का कानूनी विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ द्वारा इस परिसर को मूल रूप से वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर घोषित करने और मुस्लिम पक्ष के दावों को खारिज करने के बाद, मुस्लिम समाज की ओर से एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर इस आदेश पर तुरंत रोक (Stay) लगाने की मांग की गई है।

इस संवेदनशील मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को बेहद कड़ा कर दिया है और परिसर के भीतर आगामी धार्मिक गतिविधियों को लेकर कड़े निर्देश जारी किए हैं।

क्या था मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला?

मई 2026 के मध्य में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था। यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा करीब 98 दिनों तक किए गए वैज्ञानिक और पुरातात्विक सर्वेक्षण की विस्तृत रिपोर्ट पर आधारित था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें स्पष्ट की थीं:

  • परिसर का चरित्र: कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट में मिले साक्ष्यों को प्रामाणिक मानते हुए कहा कि यह संरचना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा निर्मित एक प्राचीन संस्कृत शिक्षण केंद्र और मां सरस्वती का मंदिर थी।

  • 2003 की व्यवस्था रद्द: कोर्ट ने साल 2003 से चली आ रही उस व्यवस्था को पूरी तरह निरस्त कर दिया, जिसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने हिंदुओं के पूजा के अधिकार को निरंतर रखने का आदेश दिया।

  • मस्जिद के लिए अलग जमीन: मुस्लिम पक्ष के धार्मिक अधिकारों के संतुलन के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि यदि मुस्लिम पक्ष आवेदन करता है, तो उन्हें मस्जिद निर्माण के लिए धार जिले में ही किसी अन्य स्थान पर वैकल्पिक भूमि आवंटित की जाए।

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की याचिका और आपत्तियां

हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ काजी मोइनुद्दीन और कमाल मौला वेलफेयर सोसायटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। मुस्लिम पक्ष का मुख्य तर्क है कि यह फैसला उनके सदियों पुराने धार्मिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

इससे पहले मार्च और अप्रैल 2026 के दौरान भी मुस्लिम पक्ष ने एएसआई द्वारा की गई वीडियोग्राफी के साक्ष्य पूरी तरह साझा न किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने तब स्पष्ट किया था कि वीडियोग्राफी और अन्य साक्ष्यों से जुड़ी सभी आपत्तियों पर हाईकोर्ट अंतिम सुनवाई के दौरान ही विचार करेगा। अब अंतिम फैसला आने के बाद मुस्लिम पक्ष ने मुख्य निर्णय को ही चुनौती दी है।

इसके जवाब में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस (हिंदू पक्ष) ने भी सुप्रीम कोर्ट में पहले ही कैविएट (Caveat) दाखिल कर दी है, ताकि अदालत उनका पक्ष सुने बिना मुस्लिम पक्ष की याचिका पर एकतरफा स्टे न दे।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

इस कानूनी मोड़ ने देश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भी नई चर्चा छेड़ दी है।

  • सत्ता पक्ष का रुख: बीजेपी और सहयोगी संगठनों ने हाईकोर्ट के इस फैसले को “ऐतिहासिक” और “सांस्कृतिक न्याय” के रूप में देखा है। उनका कहना है कि पुरातत्व विज्ञान ने सच को साबित कर दिया है और अब वाग्देवी की मूल मूर्ति को इंग्लैंड से वापस लाने के प्रयास तेज होने चाहिए।

  • विपक्ष और मुस्लिम संगठनों की चिंता: विपक्षी नेताओं और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के फैसलों से पुराने और शांत हो चुके विवाद फिर से खड़े हो सकते हैं। उनका तर्क है कि यह निर्णय 1991 के ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ की मूल भावना के खिलाफ जा सकता है, जो किसी भी धार्मिक स्थल के 1947 के स्वरूप को बदलने से रोकता है।

वर्तमान स्थिति और सुरक्षा के कड़े इंतजाम

ताजा प्रशासनिक अपडेट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में मामला सूचीबद्ध होने और आगामी कानूनी प्रक्रियाओं के बीच धार जिला प्रशासन बेहद सतर्क है। सुरक्षा कारणों और कानून-व्यवस्था की संवेदनशीलता को देखते हुए फिलहाल परिसर के भीतर शुक्रवार की नमाज आयोजित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया है। मुस्लिम समाज के स्थानीय प्रतिनिधियों ने भी शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रशासन के साथ सहयोग करने और परिसर के बाहर नमाज अदा करने की बात कही है।

अब पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के आगामी रुख पर टिकी हैं कि क्या सर्वोच्च अदालत हाईकोर्ट के फैसले के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाती है या एएसआई के वैज्ञानिक दावों को बरकरार रखती है।

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